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Mar 8, 2015

ये केंकड़े !

ना कुछ तेरे बस में ,

न कुछ मेरे बस में ,

सोये हुए लोगों की भी

क्या कोई व्यवस्था होती है ?

या उन्मादी रट्टू तोतों की ,

क्या कोई व्यवस्था होती है ?

हम अच्छे हैं ,वो बुरा है ,

मेने जो माना वो अच्छा है ,

में विराट हूँ ,तुम छोटे हो /

इन्ही सब ,इन्ही सबसंकरी गलियों में ,

प्रेम विहीन सपाट चेहरे ,

टोकरी में रखे ,

केकड़ों की तरह ,

एक दूसरे को  नीचे  ,

और नीचे खींच रहे हैं /

 

ये लंका के लोग !

सोचा ,लिखा ,कागज को बुरा लगा /
क्यूँ उसके ऊपर रोज़ ,
कलम चलाता हूँ ,
सोच सोच कर ,
लिख लिख कर ,
क्या कभी कुछ ,
परिवर्तन हो पाया है ?
ये सोये हुए लोग ,
समृधि के कोहरे में /
लंका की प्रजा की तरह ,
पूजा पाठ में लगे हैं ,
या फिर ,
सुरबालाओं और सूरा की मधुशाला के ,
नृत्य व संगीत में ,
कहीं खो गए हैं /

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