Feb 3, 2013

नहीं हूँ आभास

मुठ्ठी में लिए शब्द 
बिखरा दिए आस्मा मे 
छितराए से ,इतराए से 
जा मिले सितारों से 
 सितारों की उदासी दूर 
मैं  फिर अकेला ,
नशे में चूर /
  क्या है सबब  ,
क्यूँ  ये उदासी
ये चाहत है किसी की 
या चाहत है ओढी सी  ?
 खेलूँगा फिर शब्दों से 
दिखाऊंगा फिर छन्दो से 
ओ दूर वालों ! देखो !
क्या क्या बुनने की नियत ,
रूमी की रूमानियत ,
ये ओढ़े हुए लिबास ,
नहीं यूँ शक  न करो 
में सच हूँ ,
नहीं हूँ आभास //

2 comments:

Isha said...

main sach hoon........nahi hoon abhaas........utkrisht.....kamal hai bikhraye shabdon ka...........

Neeraj Tyagi said...

धन्यवाद् आभा जी