मनुष्य के उस पार ,
मानवीय मस्तिष्क के पार ,
कुछ है ,जो समझ से परे है /
जो देखा वो माना !
जो सुना ,वो विश्वास किया ,
जो न जाना ,तर्क से परखा ,
जिसकी कोई सीमा नहीं ,
पुस्तकों शास्त्रों में बंद वो ,
मानवीय प्रेरणा ,निशब्द /
बुद्ध के मौन में मिला ,
शांत सब कुछ !
विस्फोट असीमित शक्ति सा ,
अनवरत तरंग सा ,
स्वयं को प्रकाशित करता /
में हूँ में हूँ का नाद करता ,
सब प्रश्नों को व्यर्थ करता ,
शांत सब कुछ ,भाव में वो
प्रेम के मौन में मिलता !
behtarin.....abhar
ReplyDeleteTHNX
Deleteप्रेम की मौन भाषा बहुत कुछ कहती है......अद्भुत अभिव्यक्ति.....
ReplyDeletethanx a lot :)
ReplyDeleteअभिव्यक्ति ओर अनुभव दोनों ही दृष्टि में आप की पकड़ उत्तम है, यही नहीं बल्कि आपकी कवितायेँ मानव मन की गहराईयों के मौन को प्रस्तुत करती हैं! आप जीवन के सत्यो का आकलन कर, उनमे से चिरंतन पक्छ को ग्रहण और आत्मसात करते हैं, जो एक कलाकार का परम उदेश्य है, इस सुन्दर रचना के लिए मित्र !आपका बहुत बहुत आभार!
ReplyDeleteआगामी शुक्रवार को चर्चा-मंच पर आपका स्वागत है
ReplyDeleteआपकी यह रचना charchamanch.blogspot.com पर देखी जा सकेगी ।।
स्वागत करते पञ्च जन, मंच परम उल्लास ।
नए समर्थक जुट रहे, अथक अकथ अभ्यास ।
अथक अकथ अभ्यास, प्रेम के लिंक सँजोए ।
विकसित पुष्प पलाश, फाग का रंग भिगोए ।
शास्त्रीय सानिध्य, पाइए नव अभ्यागत ।
नियमित चर्चा होय, आपका स्वागत-स्वागत ।।
आप बहुत अच्छा लिखते हो!
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