Jan 23, 2012

"माँ "

यक्ष प्रश्न सा ,
माँ का आँचल
क्यूँ सुभीता
सामीप्य माँ का
तरसाता सब को
क्यूँ स्नेह जीता /

2 comments:

prakriti said...

स्नेह की निर्मल नदी-निर्बंध जैसी माँ
कर्म की क्यारी की तुलसी-गंध जैसी माँ
युग-युगों से दे रही कुर्बानियाँ खुद की
कुर्बानियों के शाश्वत अनुबंध जैसी माँ
जोड़ने में ही सदा सबको लगी रहती
परिवार के रिश्तों में सेतु-बंध जैसी माँ
फर्ज के पर्वत को उंगली पर उठाती है
कृष्ण-गोवर्धन के एक संबंध जैसी माँ
वो मदर मेरी, अलिमा हो या पन्ना धाय
प्यार, सेवा, त्याग के उपबंध जैसी माँ
माँ के पाँवों के तले जन्नत कही जाती
भागवत के शाश्वत स्कंध जैसी माँ...

neeraj said...

वाह ! मेरे से अधिक तो आपने कह दिया :)