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Nov 25, 2017

बात है

समझ ,समझ से 
समझ को समझो 
समझ से समझना 
बड़ी बात है 

बुद्धि परायी 
काम न आयी 
स्वयं को जानो 
तभी बात है /

इधर उधर यदि 
व्यर्थ की बाते 
दिन हों व्यतीत 
फिर वही रात है /


किसने   बदला 
इस जगती को ?
स्वयं को बदला 
तभी  बात है /

Oct 25, 2016

हला हल

पल भर जीवन
अर्पित तन मन
स्वप्निल बादल
निराश दल दल //
       अब वही फिर वही पल
       पी चुका फिर हला हल
       रूह क्या ,तेरी या मेरी
       ज़ुदा नहीं ,नहीं विचलित//
हो चुके जो अब व्यतीत
वही वह बनाते अतीत
याद जैसे हो झरोंखे
द्रश्य फ़िर वह नए अनोखे //
          नये भाव स्मृति पटल पर
          नए गीत नयी कलम पर
          रात्रि सर्प कहीँ अद्रश्य
          तू ही तू तेरे ही द्रश्य //
चाँद रात  झूमते पलाश
मै औ तू निरभ्र आकाश
ध्यान किसका कौन लीन
मेँ औ तू बस अब विलीन //

Jun 5, 2016

कहाँ गया चाँद !

कहाँ हैं खग कहा हैं मृग
बस धुआँ उगलती गाड़ियां
बड़े शहरों की जग मग /
फूल भँवरे वो पर्वतों की श्रेणी
खो गयी कही वो नदियों की कल कल
जहाँ सुन्दरी गूँथती थी वेणी /
देखो उधर वो आग का गोला
जँगलों को निगलता बस  छोटा सा शोला /
कट रहे हैं जंगल हो रहे हैं भूस्खलन 
वृक्ष तो वृक्ष  पशु पक्षी भी  कम /
आखिर कब तक बस यही क्रम
मशीनों की भयानक खट खट में
खो गयी वो लताओं की वाटिका
कहाँ वो पुष्प पल्लवित
जहाँ कोयल की थी कूक                            
मानो मयूरों से नृत्य में
कहीं हो गयी चूक //
देखो डालियों के झुण्ड में
था बया का वो घोंसला
नोच ही डाला किसी ने
किसी शैतान सा था होंसला //
जंगल जंगल धुएँ के बादल
अब कही खो गयी वो शेर की मांद
छुप गया वो आसमां
दिखा न कब से
दादी का चाँद //

Mar 8, 2015

ये केंकड़े !

ना कुछ तेरे बस में ,

न कुछ मेरे बस में ,

सोये हुए लोगों की भी

क्या कोई व्यवस्था होती है ?

या उन्मादी रट्टू तोतों की ,

क्या कोई व्यवस्था होती है ?

हम अच्छे हैं ,वो बुरा है ,

मेने जो माना वो अच्छा है ,

में विराट हूँ ,तुम छोटे हो /

इन्ही सब ,इन्ही सबसंकरी गलियों में ,

प्रेम विहीन सपाट चेहरे ,

टोकरी में रखे ,

केकड़ों की तरह ,

एक दूसरे को  नीचे  ,

और नीचे खींच रहे हैं /

 

ये लंका के लोग !

सोचा ,लिखा ,कागज को बुरा लगा /
क्यूँ उसके ऊपर रोज़ ,
कलम चलाता हूँ ,
सोच सोच कर ,
लिख लिख कर ,
क्या कभी कुछ ,
परिवर्तन हो पाया है ?
ये सोये हुए लोग ,
समृधि के कोहरे में /
लंका की प्रजा की तरह ,
पूजा पाठ में लगे हैं ,
या फिर ,
सुरबालाओं और सूरा की मधुशाला के ,
नृत्य व संगीत में ,
कहीं खो गए हैं /

Aug 4, 2014

प्राण प्रतिष्ठा

                                                  

मौन हुआ तो अन्तः शक्ति
बोल उठा तो अभिव्यक्ति /


नेत्र बंद फिर ध्यान लगाया

कल्पित देव , मन में ध्याया /

पूज आराधन औ गुण गान

यही सहज था वही महान /

यही ,यही तो मनुष्य भाव है

पत्थर पूजें दिव्य भाव है /

मूर्ति बना यदि पूजा उसको

माना देवता ,भाव शक्ति को /
हम चेतन अव्यक्त रूप थे

प्रेम प्रीति के ऊर्ज रूप थे /

जड़ता के प्रेमी बन बैठे

इस शरीर में व्यक्त हो उठे /

मानो इश्वर कवि जैसा है

ऊर्जस्वित वह रवि जैसा है/

हम चैतन्य जड़ में स्थित

प्रेम प्रीति को करें विस्तरित /

जैसा स्रोत बने हम वैसे

ईश भाव की कविता जैसे //


Mar 17, 2014

फिर खेलो होली

जेब कतरों को देख फैल गया रोष 

भुनाया गया फिर आम आदमी का आक्रोश 

ना नीति या दर्शन

 ना चिंतन या मनन 

बस आक्रोश मे शोर 

उन्हे छोड बाकी सब चोर //

बजा चुनावों का डंका

 देश जैसे हो लंका 

चाहे जैसी होगी नीति 

मिटेगी ना कभी ये राजनीति /

खा लो प्रजातंत्र की रोटी साथ मे अचार

बस वही वह भ्रष्टाचार /

उन्होने खाया भरपेट अब तुम भी खा डालो ,

ये व्यवस्था रसीली थालीतुम भी खेलो चुनावों की होली /

चुने हुओं की लगेगी बोली 

रातों रात बदलेंगे टोली /

नये नये रंगों से फिर खेलो होली 

फिर खेलो होली //


Sep 30, 2013

नया दृश्य

मैने ज्यों उछाला राष्ट्र  शब्द
छा गया सन्नाटा ,सब निशब्द
फिर बात की राष्ट्र प्रेम की
वहां बात हुई रास प्रेम की /
शब्द ईमान औ ईमानदारी भी उछाले
उन्हें लगी मूर्खता औ मुंह पे लगे ताले /
अरे वो श्रवण कुमार अब तो बस कांवरिया
डिस्को में नाचता , अब रात भर सांवरिया /
रिश्ते नातेदार निरे समय गंवाते ,
चचा ताऊ बक बक ,बहुत सर खाते /
कविता औ छंद अब लगें चप्पो लल्लो
सुनने दो शीला या बस छम्मक छल्लो /
अब जेब कतरों से पट गयी दिल्ली
देवी के जागरणों में भक्त पड़े टल्ली//
मदरसों आश्रमों में बढ़ता अनाचार 
धर्म धर्म नहीं ,धर्म अब व्यापार /
इन  सभी दृश्यों का ना अब कोई अंत 
सत्य जहाँ दिखता ऐसा न कोई पंथ /
भ्रष्ट हुए तंत्र अब भ्रष्ट सारे मंत्र //

May 14, 2013

वह न आई !

कहीं दूर 
कोई आहट सी 
शायद उसी की 
वहां किसी मोड़ 
सांझ का दीवट 
वहीँ फिर में छुपा सा 
सहसा 
उठती हुई ध्वनिओं का 
अहसास सा हुआ 
वहीँ तो छोड़ा था उसे 
की शायद याद न आये 

 वह फिर आई 
 किन्तु 
 वह न आई !

Mar 10, 2013

नेता महान

मै भारत का नेता हूँ 
नेता नहीं अभिनेता हूँ 
चमचे चिपकें जैसे गोंद 
धोती नीचे हिलती तोंद //
मेरी तोंद बढे हो मोटी 
सारे चेले सेंके रोटी 
जहाँ कहीं भी फिर में जाऊं 
मालाओं से लदता जाऊं //
भाषण देता खूब उबाऊ 
राजनीती में सदा बिकाऊ 
कहीं मंच पर खड़ा करो तो 
गला फाड़ फिर खूब पकाऊँ //
नाक नुकीली ,हो या चपटी 
कोई फर्क नहीं मै कपटी 
श्वेत झकाझक बगुले जैसा 
रंग बदलता गिरगिट जैसा //
मै भारत की दलदल हूँ 
दले बदलता छल बल हूँ 
रातों रात पार्टियां बदलूं 
एक तोड़कर नयी बना लूँ //
ऐसी भारत की गरिमा हूँ 
गरिमा नहीं करिश्मा हूँ 
प्रजातंत्र की नीव हूँ मै 
गलियों से पोषित जीव हूँ मै //
जब भी मै चुनकर आ जाऊं 
एमपी एमएलए बन जाऊं 
सारे वादे भूल भाल कर 
सत्ता मद में ऐंठा जाऊं //
घोटालों  में नाम बड़ा 
भक्त बनें छोटा या बड़ा 
फिर नवीन वादे रच जाऊं 
और चुनावी बिगुल बजाऊं //
मैं ही चलाता तंत्र देश का 
मै ही भक्षक स्वतंत्र देश का 
स्वछन्द आचरण करता हूँ 
नए कानून बनाता हूँ //
जो नर मेरे आसपास हैं 
पूर्ण निकम्मे ख़ास खास हैं 
मंत्री बन बदलूं सभी का हाल 
सारे निकम्मे मालामाल //
ऐसा हूँ भारत का नेता 
नयी पीढ़ी का में ही प्रणेता 
छोड़ योग्यता के सोपान 
बन जा तू नेता महान 
बन जा तू नेता महान //

Feb 3, 2013

गिरने की यातना

दरख़्त पे चिड़िया 
फुदकती घोसले में बया 
अहसास क्यूँ न हुआ /
पत्ते बंधे शाखों से 
कैदी बने झुरमुट से 
वो चिड़िया मुक्त पक्षी 
पत्ते मुक्त भी हुए 
तो भी गिरेंगे 
कुचले जायेंगे 
सोंधी  ज़मीनों पे 
काश वो भी चिड़िया होते 
उनके भी पंख होते 
न गिरते न कैदी होते 
गाते से उड़ते से 
ऊंचे और ऊंचे उन्मुक्त 
दूर उसी बंदीगृह से 
और उस गिरने की यातना से //

भ्रम दूर

यूं अतल गह्वर में 

खो गया सतहों से दूर 

भ्रमों ने खूब नाच नचाये 

मधुर भयावह स्वप्न लहराए

 डूबता गया ,किनारों से दूर 

मूँगों के झुरमुट ,

मोतियों की सीपियाँ 

ध्वनि विहीन अनगिनत दृश्यावलियाँ 

हो चूका बस अब ,

हुआ मैं चूर 

हुए स्वप्न बहुत ,

हुए भ्रम दूर //


नहीं हूँ आभास

मुठ्ठी में लिए शब्द 
बिखरा दिए आस्मा मे 
छितराए से ,इतराए से 
जा मिले सितारों से 
 सितारों की उदासी दूर 
मैं  फिर अकेला ,
नशे में चूर /
  क्या है सबब  ,
क्यूँ  ये उदासी
ये चाहत है किसी की 
या चाहत है ओढी सी  ?
 खेलूँगा फिर शब्दों से 
दिखाऊंगा फिर छन्दो से 
ओ दूर वालों ! देखो !
क्या क्या बुनने की नियत ,
रूमी की रूमानियत ,
ये ओढ़े हुए लिबास ,
नहीं यूँ शक  न करो 
में सच हूँ ,
नहीं हूँ आभास //

Jan 5, 2013

नवागत का स्वागत

नवागत का स्वागत 
रहें सदा जाग्रत 
फूलें फलें बना रहे हर्ष 
ऐसा रहे यह नव वर्ष /
भूलें जो हुआ व्यतीत 
सबक लें ,बनें कालातीत //
मन में रहे प्रार्थना 
करते रहें उपासना 
पुष्प गुच्छ से रहें पल्लवित 
नए साल में रहें उल्लसित //
श्रेष्ठता के नित नए प्रयास 
गिर कर उठें ,फिर बढ़ें 
छोड़ें ना अपनी आस //
महिलाएं हैं आन बान 
भारत वर्ष की शान ,
उनको दें सम्मान और प्यार 
फूले फले बगिया ,रहे सुगन्धित बयार //

Dec 29, 2012

ओ निर्भया !

ओ निर्भया !
हिल गया हिमालया 
संभले न संभलती अब हृदय की पीर 
छलक उठे अश्रु ,बह उठे नेत्र नीर ,/
ये छह मानव  , पशु से भी बदतर 
ये  दानव हैं ,पशु भी इनसे  बेहतर /
क्रूर से भी क्रूर ,वो छह नशे में चूर ,
माँ याद करे किलकारी ,बेटी हुई दूर /
 बेटी के आर्तनाद से ,कांपी होगी धरा ,
आर्यावर्त देश ,बच्चे बच्चे का दिल भरा /
रात्रि में वोह   कालिमा थी बस ,
वो  बस में ,बेबस थी जस की तस /
अब वहां ना था कुछ शेष  ,
अरे मानव ! बस तेरा अवशेष  
बस तेरा अवशेष  !

Dec 1, 2012

प्राण प्रतिष्ठा

मौन हुआ तो अन्तः शक्ति 
बोल उठा तो अभिव्यक्ति /
नेत्र बंद फिर ध्यान लगाया 
कल्पित देव , मन में ध्याया /
पूज आराधन औ गुण गान 
यही सहज था वही महान /
यही ,यही तो मनुष्य भाव है 

पत्थर पूजें दिव्य भाव है /
मूर्ति बना यदि पूजा उसको 
माना देवता ,भाव शक्ति को /
हम चेतन अव्यक्त रूप थे
प्रेम प्रीति के ऊर्ज रूप थे /
जड़ता के प्रेमी बन बैठे
इस शरीर में व्यक्त हो उठे /
मानो इश्वर कवि जैसा है
ऊर्जस्वित वह रवि जैसा है
हम चैतन्य जड़ में स्थित
प्रेम प्रीति को करें विस्तरित /
जैसा स्रोत बने हम वैसे
ईश भाव की कविता जैसे //

Oct 17, 2012

"लाल बत्ती"

यूँ चली सांस 
बढ़ती  रही आस 
अख़बारों के पन्ने 
खबरें कुछ ख़ास /
देखो कालिखों का खेल 
विज्ञापित हुई 
प्रतिष्ठाओं की सेल /
आरोपों के झड़ी
वक़्त के साथ बढ़ी /
भ्रष्ट हुए तंत्र 
फूला फला प्रजा तंत्र /
न कोई आदर्श या विचार 
बस वही वह  भ्रष्टाचार /
ईमानदारी से यूँ  मुंह चुराओ 
अनपढ़ों  की नौकरी लगवाओ /
दस शातिरों  को बनाओ ठेकेदार 
वाह वाह करें सब 
होयें  भतीजे मालदार /
इसी तरह बनेंगे 
अब "आम " से " ख़ास "
"भारत निर्माण " की 
यही एक आस /
संदेह न करेगा 
कोई भी रत्ती 
गाडी मिलेगी 
और ऊपर लाल बत्ती //

Sep 3, 2012

आह !

उन्मुक्त गगन 
बादल सघन 
उड़ते पक्षी 
करते नर्तन 
दो पंखो से 
लहराते से ,
असीम आकाश 
 छूने की चाह ,
ओह लघु जीवन !
ओह यह आह !

Aug 5, 2012

"चल भ्रम उड़ जा "

अब शोर बीच यूँ
कुछ तो बोलो 
इस चुप्पी को 
कुछ तो खोलो /
ढूंढ रहा यूँ 
कब से तुमको 
धुंध हटा अब 
देख  उजाला  
इस जग में 
मत रह  मतवाला 
आँख नशीली 
खोल ,  बोल अब  /
यही रहस्य तो 
यही  सौंदर्य  है /
अब भ्रम उड़ जा 
उड़ बादल सा 
आ यथार्थ अब 
दूर उड़ा जा 
स्वप्न चिरैया 
दूर कहीं अब 
आ प्रभात रवि 
उद्भासित कर जा 
चल भ्रम उड़ जा /

May 30, 2012

" प्रेयसी "

साथ तेरे 
रोदन 
साथ तेरे 
क्रीडा 
यहाँ 
वहां 
जहाँ 
तहां ,
परछाई सी 
तू  है 
तू ही 
जीवन का रस 
प्रेम !

May 28, 2012

"अनुभव "

मौन 
एक प्रार्थना 
जीवन 
एक आराधना 
सामीप्य तुम्हारा 
बस 
एक उपासना //

Apr 12, 2012

रच पाओगे ?

अब यह  तुमने 
क्या  कह डाला 
इश्वर को "कल्पित "
कह डाला ?
सोचो -रचा 
उसीने तुमको /
क्यूँ भूले वह  
रचता सबको ?
तुम अब  रूप ही 
उस का रचते /
जैसा रचते 
वैसा बनते /
फिर  तुम हो 
अंश मात्र ही ,
रचना उसकी 
नाम मात्र ही /
उसको तो क्या 
रच पाओगे 
क्या अपने को 
रच पाओगे ?

Mar 26, 2012

ये परखा तो

कौन कहाँ कैसा है प्याला 
ये परखा तो कैसी हाला 
परख परख मत बुन ये जाला 
पंछी बन उड़ पंखों वाला 
प्रेम सुरा पी बन मतवाला  //

"मैं"गया किधर?

एक अजनबी अनजाना सा 
नयन मिल गए फिर जाना सा ,
बार बार क्यूँ दृष्टि  उधर ही 
हर दृष्टि "मैं"गया किधर ही !
मूक नयन जादू कर जाते 
दृष्टि प्रेम का रस भर जाते /
नयन नयन से क्यूँ लड़ जाते 
बिन साकी प्याला भर जाते /
आ प्रियतम अब इसको पी लें 
भंग सुरा बिन मस्ती जी लें //

Mar 18, 2012

बंदी आत्मा

न मूल्य न चरित्र ,न धारणा न धर्मं
बस आधिपत्य ,धनोपार्जन ही कर्म /
मैं और मेरा ,यहाँ वहां साम्राज्य
परिवार हुए समूह, राष्ट्र बने राज्य //
यही तो युगों युगों से स्वार्थ का सपना
जो हो चतुर धनी ,वही सिर्फ अपना //
ऊंचे घरोंदे ,वो पत्थरों की बुलंदी
माटी के पिंजरे ,वहीँ आत्मा बंदी //

Mar 15, 2012

दृश्य शक्ति

सूरज !
क्या कभी छिपता है ?
चाँद !
क्या कभी घटता है ?
ये तो हम हैं
और हमारी दृश्य शक्ति
उतना उजाला
जितनी शक्ति //

Mar 14, 2012

मैं

मैं लहर सा
एकत्र हुआ
व्यक्त हुआ
फिर विलीन
कहीं और
कोई और
किसी और
कला में
व्यक्त होने के लिए //

Mar 12, 2012

"छा जाता"

नदी चपल सी
समुद्र में समाती
समुद्र गंभीर
गहन विस्तरित
ज्वार भाटों से अविचल
लहरों को सहता
शांत ,सम भाव सा
सब कुछ समा लेता
जहाँ नहीं है वहां भी
बादलों से ,
छा जाता //

Mar 11, 2012

"चेहरा "

हर रोज़ नज़र आता , भोला नया सा चेहरा
वो हुस्न की बला सा ,नज़रें गड़ाए चेहरा //
अब एक ही नज़र पे ,वो मुस्कुराये चेहरा
ये मेरी शायरी है ,क्यूँ शरमाये चेहरा //
पेश किया जो गुल को ,गुलाबी हुआ वो चेहरा
दिल को कब औ कैसे ,चुरा गया वो चेहरा //
चेहरे को खूब खोजा , दिखता तुम्हारा चेहरा
हर चेहरे में छुपा सा , ज़ाना तुम्हारा चेहरा //
बाज़ार में तो यूँ भी ,चेहरे पे एक चेहरा
प्याज की वो मानिंद ,अब परत परत चेहरा //
पर वो गुलाब चेहरा ,जाना तुम्हारा चेहरा
नज़रें हटा ना पाऊं ,ये बे-हिजाब चेहरा //
अब आशियाने में भी , लो पुत गया है चेहरा
बहुत हो चूका अब , ज़ाना हटा दे पहरा //
अब ख्वाब आस्मां के , क्यूँ उदास चेहरा
अब उर्दू में कहा है , क्या यूँ ही सुर्ख चेहरा //

Mar 7, 2012

"इस होली तू लगती न्यारी "

इस होली तू लगे अनूठी
रंग खेले ना अब क्यूँ रूठी ?
ला गुलाल अब खेलूं होली
मस्त हुई रंगों की टोली
धूलिवंदन बिन भंग अधूरा
तू मद मस्त रंग है पूरा /
ला टेसू रंग ,सारा रंग दूँ
अंग बचे ना ,अंगिया रंग दूँ
उधर कहीं तू छुपती कब तक
पिचकारी से बचती कब तक ?
बच्चे दूर वहां किलकारी
अब रंग रंगी लगी तू प्यारी
ना भाग कहीं तू खा पिचकारी
इस होली तू लगती न्यारी //

Mar 6, 2012

मिलन करा या पास बुला जा

ओ आसमान अब नीचे आ जा
इस धरती को यूँ ना तरसा
ना जाने कब से ये धरती
घूम घूम कर ढूंढ रही है
सूर्य देव अब दे वर दे दे
पृथ्वी को अपना प्रिय दे दे /
तुम प्रेम पीर को क्या समझे
वोह आसमान को वर समझे
नित सूर्य अग्नि फेरे चाहत के
नित नए भाव नयी ऋतुओं के /
ये धरती कुछ माँगा करती
क्यूँ बादल से ही अर्ध्य चढ़ाती/


वो जंगल धूँ धूँ क्यूँ जलते
इस धरती के बीचों बीच /
निशा काल में क्यूँ लहराती
ये आँचल सी तारों बीच /
ये धरती की ही विरह अग्नि
क्या दावानल बन जाती है
जब धरती रुक रुक रोती है !
क्या तभी सुनामी आती है ./

ओ चाँद उतर अब नदिया आ जा
इस धरती को कुछ समझा जा
अब रात अमावस यूँ ना खो जा
मिलन करा या पास बुला जा //

Mar 3, 2012

"अहंकार "

मैं अद्वितीय
कहीं विशेष
समग्र सृष्टि से
न जुडा शेष ,
यही यही जब
भ्रम को पाला
इसी अहम् ने
फिर डस डाला //

Mar 1, 2012

"अस्तु देवता "

जैसा हम सोचा करते हैं
वैसे ही हो जाया करते /
प्रतिपल दिव्य हमारे मानो
उन्हीं देव को उनमे मानो //
"अस्तु देवता " यत्र-तत्र सब
कहें "तथास्तु" पूर्ण करें सब /
भला बुरा यदि , कहा अनजाना
वही "तथास्तु " हुआ यह जाना //

तब याद तुम्हारी आये

मेरा चाँद आज क्यूँ खोया
ये आसमान क्यूँ सोया
जब भ्रमर कुमुदिनी डोले
दिल उठे हिलोर यूँ हौले
वहां दूर कहीं कोई गाये
दिल उमड़ उमड़ सा जाये
चहुँ ओर बसंत लहराए
यौवन मदमस्त गदराये
तब याद तुम्हारी आये
तब याद तुम्हारी आये //

Feb 28, 2012

प्रेम लय

वो जब जब ख्वाबों में आती
नए नए रूपों में आती
प्रेम कुञ्ज में बैठे होते
शांत मौन कुछ कहने आतुर
एक शब्द भी कह न पाते
शब्द शब्द ही बने महत्व का
पलकों में जुगनू से दीखते
अश्रु मोती बन ढल जाते
यू सब कहा अनकहा होता
मौन नयन मोती कह जाते
होंठों के कम्पन सी वो लयप्रेमी उस लय में रम जाते //

Feb 23, 2012

दहलीजों के पार बुला ले

चुपके चुपके झाँका करता
चेहरा चाँद नज़र आ जाता
दरवाजे की ओट खड़ा सा
फिर पीछे मैं हट सा जाता /
नयन सजीले नयन झुकाती
मंद मंद वो क्यूँ मुस्काती /तन्द्रिल आँखों में मधुरिम से
कोमल स्वप्न सलोने लाती /
फूलों पर फिर उड़ें तितलियाँ
बदली गरजे ,गिरे बिजलियाँ
मौन होंठ भी कह ना पाते
कम्पन सा अन्दर भर जाते /
लुका छिपी ये आखिर कब तक
रहूँ खड़ा मैं आखिर कब तक
दूर दूर अब पास बुला ले
दहलीजों के पार बुला ले //


Feb 21, 2012

मै नशे में

शब्दों को बुन कर
भावों को चुनकर
लिखूं एक तराना
वही वह पुराना /
दो प्रेमियों की
फिर वो कहानी
न मेरी जुबानी
न तेरी जुबानी /
मस्ती तुम्हारी
कुछ मस्त में भी ,
बसे यहाँ बस्ती
वही प्रेम मस्ती /
रुनझुन सी पायल
करे दिल को घायल /
नज़र ना हटे ये
ये आँखों का जादू
मजबूर तुम हो
मजबूर मै हूँ /

जहाँ तुम नशे में
वहीँ मै नशे में //

Feb 20, 2012

महा रात्रि ये पार्वती की

चतुर्दशी यह
घोर रात्रि ,
महा रात्रि यह
शिवा रात्रि /
याद फिर वह
नृत्य शिव का
लय-प्रलय को
लीलती सी /
फिर वही वह
घोर रौरव
शिव त्रिनेत्री
शिवा तांडव /
माह फाल्गुन
महा रात्रि
फिर वही वह
शिवा रात्रि /
देख दूल्हा
शिव बना फिर
काल भैरव ,
शिवा रौरव
चल पड़े
नरमुंड कितने !
सुर असुर औ
बुरे कितने !
यही है बारात उसकी
महा रात्रि ये पार्वती की //

Feb 18, 2012

स्वीकार कर ले

ओ पथिक तू सोच खोया
मौन है क्या जाग रोया ?
पीर है ये तीर सी है
आँख गीली नीर सी है /
देख वो भी कहाँ सोती !
रख संजो ले नयन मोती /
जा कहीं मनुहार कर ले
ओ पथिक स्वीकार कर ले
तू अकेला न था सृष्टि का
बूँद भर था उसी वृष्टि का
जा कहीं सत्कार कर ले
प्रेम को स्वीकार कर ले /
ओ विरागी धूमकेतु !
गतिमान तीव्र कहाँ किस हेतु ?
आ यहाँ विश्राम कर ले .
प्रेम को स्वीकार कर ले ,
नृत्य कर ले ,गीत गा ले
छोड़ गति तू धुरी पा ले /
ओ पथिक स्वीकार कर ले ,
जा कहीं मनुहार कर ले /

Feb 16, 2012

न तू अधूरी

न तू अधूरी
न मैं अधूरा
किन्तु कहाँ कैसे हम
कहें स्वयं को पूरा ?
कहीं ,कहीं तो कुछ है
नहीं ,नहीं है मुझ में
कहीं खोजता सा
कहीं खींचता सा ,
नया न कुछ बनाता
नया न कुछ कहता ,
फिर उसी मिलन से
फिर वहीँ समाता /
प्रकृति के नियम सा
फिर रचूँ अधूरा ,
न तू उधर पूरी
न मैं इधर पूरा/

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